ऋतुराज बसंत

ऋतुराज बसंत

हमारे देश में छह ऋतु होती हैं। यह सभी पृथक-पृथक अपना रंग दिखाती हैं। इस सब में बसंत ऋतु का आगमन सबसे पहले होता है। बसंत ऋतु का आगमन चैत्र व वैशाख मास के महीने में होता है। यह ऋतुओं का राजा कहलाता है। इस ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य सबसे ज्यादा होता है या कहें तो बढ़ जाता है। फूलों पर तितलियां मंडराती है और रस का पान करती हैं। गुलमोहर, सूरजमुखी, चंपा, चमेली व लिली के पुष्पों के सौंदर्य से आकर्षित हो रंग बिरंगी मधुमक्खियां व तितलियों में रसपान करने की जैसे होड़ सी लग जाती है। इस ऋतु का कवियों पर भी प्रभाव पड़ता है कवि भावुक हो जाते हैं और इसके सौंदर्य को देख भावुक ह्दय वालों का मौन रह पाना बड़ा कठिन हो जाता है। यह त्यौहार बसंतपंचमी के दिन बड़े उल्लास से मनाया जाता है। जानकी देवी सरस्वती का जन्म बसंत पंचमी को हुआ था। इस दिन बच्चे और महिलाएं बसंती वस्त्र पहनकर आनंद के साथ दोपहर तक रंगक्रीड़ा करते हैं। संध्या समय बसंत मेला लगता है जिसमें लोग एक दूसरे के गले लगकर अपने मेलजोल और आनंद का प्रदर्शन करते हैं। कही कही पर बसंत पर पतंग उड़ाने का आयोजन भी होता है। जिसमें बच्चे और बड़े उत्साह के भाग लेते है। इस दिन सबमें आनन्द का उत्साह देखकर सभी प्राणियों में उल्लास भर जाता है। इससे जीवन में नवजीवन का संचार होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बहुत उत्तम है बसंत ऋतु में प्रातकाल घूमने से स्फूर्ती आती है। प्रातःकाल घूमने से मन प्रसन्न होता है। इस ऋतु में ना तो अधिक गर्मी और ना अधिक ठंड होती है। यह देवदूत बसंत जन-जन को नव निर्माण और हास-विलास के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होते रहने के लिए प्रेरणा देता है।